खंडवा। डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, खंडवा एवं भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पाँच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का सफल समापन हुआ। सेमिनार का विषय “कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था एवं सतत व्यवसाय : वाणिज्य और प्रबंधन में उभरती प्रवृत्तियाँ” रहा।
समापन अवसर पर मुख्य वक्ता कपिल पगनिस ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग सतत विकास और समाजहित के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई आधुनिक तकनीकों के माध्यम से मानव जीवन को अधिक सरल, उत्पादक एवं पर्यावरण के अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एआई आधारित तकनीकें उपलब्ध आंकड़ों एवं सूचनाओं का विश्लेषण कर बेहतर परिणाम और उपयोगी आउटपुट प्रदान करती हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्षमता एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।
सेमिनार संयोजक एवं अधिष्ठाता डॉ. योगेश महाजन ने कहा कि निमाड़ अंचल में इस प्रकार का यह पहला अंतरराष्ट्रीय आयोजन है, जिसने शिक्षा, शोध और उद्योग जगत को एक साझा मंच प्रदान किया। उन्होंने एआई के शिक्षा, अनुसंधान और व्यापार क्षेत्र में बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री रवि चतुर्वेदी ने विश्वविद्यालय की प्राथमिकताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, उद्यमिता और एआई आधारित तकनीकी कौशल विकास पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों में स्वरोजगार और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में अनिल सैनी ने कृषि क्षेत्र में एआई के उपयोग, जैसे रोग पहचान, स्मार्ट सिंचाई एवं मौसम विश्लेषण पर अपने विचार रखे। वहीं मृणाल हुमर ने ग्रामीण विकास और एमएसएमई क्षेत्र में एआई की संभावनाओं पर चर्चा की।
सेमिनार में देश-विदेश के विशेषज्ञ, शिक्षाविद, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में एआई आधारित बिजनेस निर्णय, फिनटेक, डिजिटल मार्केटिंग, आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन तथा ग्रामीण उद्यमिता जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. अरुण रमेश जोशी ने अपने संदेश में एआई के व्यापक प्रभाव एवं उसके नैतिक उपयोग पर विशेष जोर देते हुए कहा कि तकनीक का उपयोग मानव कल्याण और सामाजिक विकास के लिए होना चाहिए।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।